Saturday, 23 December 2017

आवाज़े जो ईलाज करती है - Sound - The medicine of Future




है न कमाल की बात कि बस सुनो और किसी भी बीमारी को दूर भगा दो. जी बिलकुल जो मैं कह रहा हूँ सच कह रहा हूँ. Sound यानि ध्वनि की तरंगो में अद्भत आरोग्यकारनी शक्तियां समायी हुई है. जी हाँ Sound आपको मुझे हम सब को heal कर सकती है.  

लेकिन जिस Sound की मैं बात कर रहा हूँ यह वो ध्वनियाँ नहीं है जो हम रोज़ सुन ही रहे है. वो एक अलग तरह की ध्वनियाँ है जिसके लिए हमें अपने ब्रेन को कम फ्रीक्वेंसी पर लेकर जाना होता है. 

Joshua Leeds एक इंटरनेशनल लेखिका है जिन्होंने एक अति महतवपूर्ण पुस्तक लिखी है “The Power of Sound” इस पुस्तक में उन्होंने बताया है कि किस तरह से विभिन्न प्रकार की ध्वनि तरंगे हमें हमारी बिमारियों से निज़ात दिला सकती है. आने वाले समय में Sound Waves का इलाज़ करने में एक सक्षम रूप में प्रयोग किया जायेगा. 

प्रसिद्ध Biophysicist Gerald Oster एक और मजेदार बात बताते है. वो कहते है कि हमारे ब्रेन के दो hemispheres है. एक को Right Hemisphere कहते है और दुसरे को Left Hemisphere. वो बताते है कि यदि एक कान में एक फ्रीक्वेंसी की टोन बजायी जाये और दुसरे कान में अलग फ्रीक्वेंसी की टोन बजायी जाये तो इन दोनों टोन से एक तीसरी तरह की टोन पैदा होगी जिसे हम binaural beat के नाम से जानेगे. यह binaural beat हमारे Mind में अपने आप ही पैदा होगी जो कि हमारे लिए एक मेडिसिन की तरह कार्य करेगी. 

इसको Hemisphere’s-Synchronization verbal meditations and music कहते है. इससे मन अपने आप ही शांत होने लगता है और जोकि हमारी गहन निद्रा में सहायक होता है. 

Jamie Bechtold अमेरिका के Los Angeles की एक Sound Healer है, उनके अनुसार Sound थेरेपी से व्यक्ति के अन्दर इम्युनिटी को बढाया जा सकता है और यह "नींद ना आने की बीमारी" यानि insomnia में सबसे ज्यादा कारगर है. 

Jeffrey Thompson, founder of the Center for Neuroacoustic Research कहते है कि Sound थेरेपी से जैसे जैसे आपके ब्रेन की फ्रीक्वेंसी कम से कम होती चली जाएगी तब आपके शरीर के हर अंग तक पंहुचा जा सकेगा और उसे दुरुस्त किया जा सकेगा. 

भारतीय योग दर्शन में नाद योग से हम ऐसा कर सकते है. नाद वो ध्वनी है हो हमें अपने आप सुनाई देती है और यह ध्वनि हर वक़्त हमारे अन्दर चल ही रही है. यह हमारे अन्दर उठने वाली ध्वनियाँ कई प्रकार की होती है और इनकी भी अलग अलग फ्रीक्वेंसी होती है. और हर फ्रीक्वेंसी में एक Healing Effect होता है जो हमें किस भी बीमारी से निजात दिला सकता है. 


ध्यान कैसे करे? (भाग - I)



ध्यान कैसे करे?  (भाग - I) 


मैं सबसे पहले आपको बता दूँ कि ध्यान एक घटना है इसलिए जैसे और घटनाएँ घटित होती है वैसे ध्यान भी घटित होता है. यह ध्यान का घटित होना हमारे, आपके हम सबके अनुभव में होता है जो अपने पीछे बहुत कुछ छोड़ कर भी जाता है, जैसे कि शांति, अच्छी आदते, सुन्दरता, अपने होने का अहसास, और भी बहुत कुछ. इसलिए ध्यान हो उसके लिए हमें तैयारी करनी पड़ती है. 

वो तैयारी दुनिया के अलग अलग धर्म और पंथ अलग अलग तरीके से सिखाते है. इस तैयारी का मकसद मन में हर पल चलने वाली बक-बक को बंद करवाना होता है. बस आप इतना समझ ले कि जब तक मन चलेगा तब तक ध्यान नहीं आएगा और जब ध्यान हमारे अन्दर किसी तरीके से घटित हो गया तो फिर वो जब तक रहेगा तब तक मन को बक-बक नहीं करने देगा. और तब जो अहसास होगा वो अलग ही होगा जिसे शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता.

इसके लिए सबसे पहले हमें अपना कनेक्शन अपनी इन्द्रियों से काटना होता है जिसे योग की भाषा में प्रत्याहार कहते है. अपनी इन्द्रियों से कनेक्शन काटने का मतलब यह है कि एक बार जो हम देख रहे है वो बंद हो जाये, जो हम सुन रहे है वो बंद हो जाये, जो हम स्वाद ले रहे है वो बंद हो जाये, जो सुगंध ले रहे है वो बंद हो जाये और जो हम स्पर्श महसूस हो जाये. इसके साथ इन सब की वजह से उभरने वाले विचार भी बंद हो जाये. क्यूंकि जितने भी विचार आ रहे है उन सब का Source हमारी इन्द्रियां ही है. 

अपने अन्दर प्रत्याहार करवाने का सबसे अच्छा तरीका योग निद्रा है. योग निद्रा कैसे करे इस पर भी मैं आपको अपना विडियो लिंक दे रहा हूँ. जब प्रत्याहार घटित होगा तो उसके बाद ध्यान अपने आप ही घटित हो जायेगा. 



ध्यान करने के लिए सबसे पहले आपको एक संकल्प लेना होगा कि आप ध्यान को रोजाना अपनी जिन्दगी का हिस्सा बनायेगे. समय जितना आप दे सके. 10 मिनट्स से शुरू कर सकते है. पर 10 मिनट daily करना है. शुरुआन प्रार्थना से करे, याद रखिये प्रार्थना आपके अपने शब्दों में होनी चाहिए. 

1. प्रार्थना आपके अपने शब्दों में (आज ध्यान हो इसके लिए प्रार्थना)
2. अनुलोम विलोम प्राणयाम चरण 1 - 15 बार
3. भ्रामरी प्राणायाम - 3 मिनट
4. अपनी सांसो पर ध्यान - 5 मिनट
5. दोनों आँखों के बीच में ध्यान - जितनी देर मन चाहे.
6. अंत में प्रार्थना आपके अपने शब्दों में. (जो आप अपने जीवन में चाहते है उसके लिए प्रार्थना)


इस विधि से शुरुआत करे. आपका धन्यवाद..


क्यां हम सच में प्रार्थना करते है ?



Prayers
Prayer


हम में से सभी अपने धर्मानुसार किसी न किसी धार्मिक स्थान पर या फिर सिद्ध स्थान पर जाते रहते है, वो सिद्ध स्थान कोई बड़ा मंदिर हो सकता है, कोई बड़ी मस्जिद हो सकती है, कोई बड़ी चर्च हो सकती है या किसी पीर की मजार भी हो सकती है. हम अक्सर जाते है ऐसी जगहों पर, अपने मन की इच्छानुसार कुछ न कुछ मांगने. उसके लिए हम Prayer करते है. यही मेरा आज का विषय है कि जब हम Prayers कर रहे होते है तो क्या हम वास्तव में Prayers कर रहे होते है.

मैं खुद के मन से ही बात शुरू करता हूँ. मेरे मन को अपनी मर्ज़ी से चलना होता था वो कभी कभार ही मेरी मर्ज़ी से चलता था आमतौर पर वो अपनी मर्ज़ी से ही चलता था. हा वो मेरी बात को सुनता जरुर था पर उसे चलता अपनी मर्ज़ी से ही था. मुझे लगता था कि शायद ऐसा ही होता होगा. पर मन ही अपनी चलाये यह कोई सिद्धांत नहीं था. कभी कभी मुझे परेशानी होती थी इस बात पर कि मन मेरी हर बात को कही से कही जोड़ उड़ा कर ले जाता था. मुझे अक्सर मेरे उद्देश्य से भटका देता था. मन का यूँ हर बात को कही का कही ले जाना मुझे कही न कही गड़बड़ तो लगता था ही. 

मैं कभी ठीक से अपनी Prayers भी नहीं कह पाता था, अभी प्रार्थना शुरू ही करता था कि मन बीच में कही का कही उड़ा ले जाता था. ऐसे में मेरी प्रार्थना कैसे भगवान् तक पहुच सकती थी. बड़ी मुश्किल से शायद की कोई मंत्र या श्लोक या ऐसा ही कुछ भी और मन के बिना भटकाए पूरा होता था. ऐसा लगता था की मेरा मन कभी नहीं चाहता था कि मैं प्रार्थना करूँ. पर ऐसा वो क्यों करता था समझ नहीं आता था; शायद अपना वर्चस्य बनाये रखने के लिए. 

एक छोटी सी Prayer ठीक से पूरी करने के लिए उसे कई बार दोहराना पड़ता था कि वो Prayer ठीक से पूरी हो जाये. क्यूँकी मन बीच में कई बार भटका देता था. ऐसे में कैसे Prayers भगवान् या देवताओं तक पहुच पाती होगी बड़ा ही चिंता का विषय था. 

इसलिए किसी भी Prayer को कहने से पहले मन को दुरस्त करना होता था, उसे साइलेंस करना होता था. उसका तरीका ध्यान था. ध्यान से मन चुप होना शुरू हो गया था. 5 मिनट के ध्यान के बाद भी कोई भी Prayer अच्छे से कही जा सकती थी. अब लगता था की Prayer कर रहा हूँ. बिना ध्यान के Prayer कहने में वो दम नहीं था जो ध्यान के बाद कहने में आता था. लगता था कि भगवान् से रूबरू हो रहा हूँ. शुरू में शब्दों पर ज्यादा जोर  रहता था. ऐसा लगता था कि कोई खास मन्त्र हो जोकि बहुत ज्यादा प्रभावशाली हो. उस कहे तो भगवान् जल्दी जल्दी इच्छा पूरी कर दे पर फिर पता चला कि मन्त्र नहीं अच्छी प्रार्थना की और उसके साथ अच्छे भाव की जरुरत है. 

Tolstoy Story Three Hemits
Three Hermits


आपने एक विश्व विख्यात किताब का नाम सुना होगा "Autobiography of a Yogi" मेरा विडियो भी है इस किताब पर. इस किताब के चैप्टर न. 30 में एक कहानी आती है जिसका का शीर्षक है "चमत्कारों के नियम" जिसमे तीन लोगो के बारे में बताया गया है जो एक ही प्रार्थना करते थे जो उनकी खुद की बनायीं हुई थी बड़ी साधरण प्रार्थना थी कि हे ईश्वर - हम तीन है, तू तीन है - हम पर दया कर. आसपास के लोग ने जब उनके बारे में सुना तो उन्हें बड़ा ही अजीब लगा कि यह क्या अजीब प्रार्थना करते है, और फिर कुछ लोग इकठ्ठे हो कर वहा के पादरी के पास गए और उन्हें बाते की वहा दूर पहाड़ी पर कुछ लोग रहते है जो प्रार्थना तो करते परन्तु गलत प्रार्थना करते है. वहा की चर्च के फ़ादर इस नाव ले कर उस पहाड़ी पर पहुचते है और देखते है की वहा तीन लोग है और वो तीन लोग भी उनके पास आते है. 

पादरी पूछते है कि आप लोग किसी तरह की प्रार्थना करते है बताएँगे जरा. वो तीन वैरागी कहते है क्यूँ नहीं फ़ादर हम जरुर बताएँगे. वो बताते है की है कहते है कि -  हे ईश्वर - हम तीन है, तू तीन है - हम पर दया कर.

पादरी कहते है कि यह तो कोई प्रार्थना हुई ही नहीं. यह बिलकुल सही नहीं है. तो वो तीन वैरागी बोले कि अच्छा है फादर सही प्रार्थना आप हमें सिखा दीजिये और हम उसे जरुर करेंगे. 

तो चर्च के फादर उन तीन वैरागियों को पूरा दिन अपने प्रार्थनाएं सिखलाते रहते है और शाम को वापिस लोटते हुए कह कर जाते है की अब तुम्हे इस तरह से प्रार्थना करनी है.और वो तीन वैरागी कहते है कि ठीक है फादर अब आप ने जो भी सिखाता अब से व्ही करेंगे. 

फादर अभी वापिस नाव में आधे रस्ते ही पहुचे थे कि क्यां देखते है कि तीन प्रकाश के पुंज बड़ी तेज़ी से पानी पर भागते हुए आ रहे है और जैसे वो प्रकाश के पुंज पास पहुचते है तो पता चलता है कि यह वही तीन बैरागी है - वो आते ही पूछते है कि फादर-फादर आप जो प्रार्थनाएं हमें सिखा कर आये थे वो हम भूल गए है कृपया एक बार फिर से हमें सिखा दीजिये. 

पादरी उनकी पानी पर चलने की उपलब्धि को देख कर हैरान थे उन्हें अचानक ही समझ आ गया था की प्रार्थना में शब्दों की नहीं भाव की ज्यादा जरुरत होती है. प्रार्थना के शब्द कोई भी हो पर अपने होने चाहिए. 

वो उन तीन वैरागियों को बोले कि आप जो प्रार्थना कर रहे थे उसी प्रार्थना को ही कीजिये और जैसे कर रहे थे वैसे ही कीजिये. जो आप कर रहे है वही सच्ची प्रार्थना है.



प्रार्थना के लिए अपने ही शब्द चाहिए थे, भाव चाहिए थे और मन की चुप्पी चाहिए थी. ऐसे नहीं है कि अन्य मन्त्र बेकार है पर सबसे मुख्य बात मन की चुप्पी है. पर अब्ब ध्यान और प्रार्थना में सबंध समझ आ गया था और उसका प्रयोग करना भी.

मौन क्यां है ?

मौन कहाँ है?




मैंने बहुत सारा लिटरेचर पढ़ा है पर एक पुस्तक जिसका नाम अलकेमिस्ट है उस किताब ने मुझे बहुत प्रभावित किया. इस बुक को ब्राज़ीलियाई लेखक पाउलो कोहिलों ने लिखा है. इस किताब में कई जगह एक मूक भाषा का जिक्र आया है. और जब जब उस मूक भाषा का जिक्र आया तो मेरे जेहन में एक रोमांच सा छोड़ गया कि किस तरीके से हम एक बिन बोली भाषा यानि मौन से जुड़े हुए है.
अध्यात्मिक यात्रा का रास्ता भी बड़ा  उम्दा होता है कई बार छोटी बात भी बहुत कुछ कह जाती है.  जैसे अलकेमिस्ट में जब जब लेखक उस अनकही भाषा की बात करता है तो पता चलता है कि मैं संसार की हर वस्तु  से जुड़ा  हुआ हूँ और हर वस्तु  से बात भी कर सकता हूँ. बस एक बार मौन सीख लिया तो. कहते है कि भाषा ही कम्युनिकेशन का तरीका है पर यदि हम उस मूक भाषा को समझना शुरू कर देंगे तो यकीन मानिये की फिर चाहे दुनिया का कोई भी व्यक्ति हो हम उस व्यक्ति को बिना बोलो ही समझ लेंगे.
हम पांच इन्द्रियों के माध्यम से इस संसार की हर वस्तु से रूबरू होते है. भारत में और विश्व में अलग अलग तरह के फिलोसोफी के स्कूल है. जो हमें बताते है कि किस तरह से किस तरह से हम इन्द्रियों के माध्यम से हमें अपने अनुभवों और अनुमानों से सीखते है. पर भारतीय दर्शन सीखने का एक बिलकुल अलग तरीका बताता है. जोकि इन्द्रियातीत है यानि हमें बिना किसी इन्द्रिय की मदद से भी सीख सकते है. कमाल है न कि कुछ भी न करो और सीख जाओ, कुछ भी न करो मतलब न पढो, न कोई टीचर हो और न को क्लास और न ही कोई शिष्य फिर भी शिक्षा पूरी हो जाये. हमारे वेद ऐसे ही आये है किसी न किसी ऋषि के जेहन में, कब आये? जब किस एक तकनीक से उनका मन इस मूक भाषा से जुड़ गया, तो बिना, क्लास, बिना किताब, बिना कुछ मैकेनिकल किये ज्ञान उभारना शुरू हो गया मानस पटल पर, मेंटल स्क्रीन.
शरू में जब मेरे सामने मौन की बात आई तो मुझे लगा कि इसमें क्या मुश्किल है बस बोलना बंद कर दो तो हो गया मौन. पर जब मैंने इस तरह से बोलना बंद करके मौन होने की कौशिश की तो मेरे मन ने अन्दर से इतना शोर मचाया की सहन करना मुश्किल हो गया. फिर पता नहीं कब मुझे पता चला कि मौन भी एक प्रकार से घटित होता है जैसे ध्यान घटित होता है और जब मौन घटित होता है तो वो तब तक रहता है जब तक उसे रहना हो. जब मौन रहता है तो मैं चाह कर भी बोल नहीं सकता. जब जब मेरे अन्दर मौन घटित हुआ तो शब्द उठने ही बंद हो गए थे बोलने का तो सवाल ही पैदा हो सकता था.

मौन जब भी आता तो गहरी साइलेंस लेकर आता, उसे ले आने के लिए मन को चुप करना होता जोकि काफी challenging था. पर ध्यान से यह मुमकिन था. मौन जब तक रहता तो आनंद बना रहता और जब मौन चला  भी जाता तब भी काफी देर तक आनंद बना रहता और मौन एक लम्बी चुप्पी भी दे कर जाता. वो लम्बी चुप्पी कुछ भी एक नए तरीके से समझने में मदद करती थी. एक और खास बात भी थी की मौन के वक़्त और मौन के बाद चुप्पी के वक़्त जब कभी भी कोई भाव उठता था तो कभी भी दुःख का भाव नहीं होता था. और उसके बाद मन में भी अच्छे विचार उठने लगते थे और वो मन जो मौन के against होता था वो मन मौन घटित होने के बाद नई उमंगो से भरा होता था. और ख़ुशी आनंद से भरपूर रहता था. 



ध्यान अपने आप ही मौन लेकर आता है. नियमित रूप से ध्यान करना और कभी कभी लम्बा ध्यान करना मौन लेकर आता है. मौन आपकी और मेरी मर्ज़ी से नहीं आयेगा, उसे जब आना होगा तो आयेगा ही और जब मौन आएगा तो आपको भी पता चल जायेगा कि वो आ गया है. तब जब मन के गहरे सागर से न शब्द उठेगे और न ही विचार तो समझ आ जाएगी की मौन हो गया.