Wednesday, 14 March 2018

क्यां आप हमेशा खुश रहना चाहते है?



आज मैं आपसे अपने थीम से हट के कुछ बात कर रहा हूँ. क्यूंकि मेरा मेरे Viewers मेरे Followers के साथ एक ऐसा रिश्ता बन गया है कि मैं उनकी यानि आप सब की भावनाओं के महसूस करने लगा हूँ. इसलिए मैंने यह विडियो बनाना जरुरी समझा और मैं आपसे रूबरू हो रहा हूँ. यह जो भी बाते है वो मैंने अनुभव की है और उन्हें समझा है.

सबसे पहली बात - मैं हर वक़्त खुश रहना चाहता था, मैं यानि आप और आप यानि मैं, पर मैं हमेशा खुश रह नहीं पाता था. बड़ी कौशिश करता मैं खुश रहने की, अच्छे कपडे पहनना, खुद का पूरा ख्याल रखना, अपने लिए अच्छी अच्छी वस्तुएं लेकर आना. पर इनमे से कुछ भी मुझे खुश नहीं कर पाता था. फिर मैंने एक बात सीखी; अपने अनुभव से ही सीखी और एक बात को Discover किया कि जीवन वही मुझे देता है जो मैं उसे देता हूँ. मुझे पता लगा कि यदि मैं अपने चेहरे पर मुस्कान चाहता हूँ तो मुझे दूसरों के चेहरों पर मुस्कान लानी होगी, यदि मैं ख़ुशी चाहता हूँ तो मुझे दूसरों के मनों में ख़ुशी  लानी होगी. इस बात का मैंने अपने जीवन में प्रयोग किया है और बदले में बहुत कुछ पाया है. आज मैं आपसे, अपने Viewers से, अपने Followers से दिल से रूबरू होता हूँ, आपकी बातों का जवाब देता हूँ आपसे फ़ोन पर बात करके आपकी समस्याओ को दूर करने की कौशिश करता हूँ तो यकीन मानिये की बदले में आप मुझे बहुत कुछ दे जाते है जिसका आप लोगो को शायद पता ही नहीं चल पाता. यह मेरा आपको गाइड करना और आपका मुझसे गाइडेंस लेना, केवल आपको ही तसल्ली नहीं देता मुझे भी देता है. जब जब आप खुश होते है यह यूनिवर्स मुझे भी उतनी ही ख़ुशी देता है जितने खुश आप हुए है.

तो यह एक नियम है कि यदि आप जीवन में ख़ुशी चाहते है तो आप बस दूसरों को खुश करना शुरू कर दीजिये. बस बाकि कार्य यह Universe अपने आप ही कर देगा.

आप यह तय कर ले कि इस हफ्ते में आपको 2 चेहरों पर ख़ुशी लेकर आनी है. बड़ा ही छोटा सा टारगेट है यह. पर बड़ी ही आसानी से पूरा किया जा सकता है और इसके बहुत ही अच्छे रिजल्ट्स आते है . जैसे की किसी भी बुजुर्ग व्यक्ति के साथ थोडा सा समय बिताना, किसी की सच्ची तारीफ करना, जैसे कि किसी पुराने दोस्त को अचानक मिलने चले जाना, किसी को उसकी खूबियों के बारे में बताना जो उसे न पता हो और बहुत कुछ है करने के लिए आप करना शुरू करेंगे तो अवसर अपने आप ही मिलने लगेगे.

दूसरी बात - मैं अब जो चाह रहा हूँ वो पा भी रहा हूँ. जी हाँ यह बिलकुल सच्ची बात है. आपने शायद इस बात पर कई पुस्तकें पढ़ी होगी, The Secret, जो चाहो सो पाओ, जीत आपकी, और भी बहुत कुछ. पर मैंने जो discover किया वो कुछ अलग ही है. मेरे अन्दर बहुत सारी इच्छाएं है कुछ मेरी अपनी है और कुछ मेरे मन की. मैंने पहले बहुत कौशिश कि मेरी यह सब इच्छाए पूरी हो, उन्हें पूरा करने के लिए बड़ी मेहनत भी की, जिससे कुछ शायद पूरी हुई भी होगी परन्तु जब मैंने ध्यान को अपने जीवन का अंग बनाया तो यकीन मानिये मेरी इच्छाए अपने आप ही पूरी होने लगी, अजीब इतेफ़ाक होता और मेरी कोई न कोई इच्छा पूरी हो जाती, वो इच्छाए भी पूरी होने लगी जो मैं शायद इच्छा करके भूल भी गया था.

दूसरा नियम यह हुआ कि जीवन में कुछ भी कीजिये ध्यान जरुर कीजिये.

तीसरी बात - मेरे जीवन में बहुत कुछ आया, बहुत सी वस्तुएं, बहुत सारे रिश्ते, बहुत सारे लोग, मुझे लगाव था उनसे, बहुत ही लगाव, लगाव एक ऐसी शक्तिशाली शक्ति है जो हमसे हमारा समय ले लेती है और बदले में पहले सांसारिक सुख देती है और इसका End हमेशा दुःख से ही होता है. धीरे धीरे समय रहते मैं इस बात को समझने लगा कि जीवन में हर वस्तु की एक समय सीमा है, हर रिश्ते की भी एक समय सीमा है, हर व्यक्ति विशेष की भी एक समय सीमा है. इसलिए यदि मैं किसी तरीके से उनसे लगाव को छोड़ दूँ तो मेरा समय भी मेरे पास रहेगा और दुखी और सुखी होने से भी बच जाऊगा. मैंने यह भी देखा की अध्यात्मिक धरातल पर बने रिश्तो में कुछ जान रहती है. मेरी इसी सोच ने ही मुझे अध्यात्म के मार्ग पर लेकर गयी. और मुझे पता चला की मुझे सुख की नहीं आनंद की खोज करनी थी.

तीसरा नियम यह हुआ कि - जीवन में कुछ भी शाश्वत नहीं है. इसलिए सुख की नहीं आनंद की खोज कीजिये. क्यूंकि सुख दुःख के बाद ही आता है.
     
  

Friday, 9 March 2018

सांख्ययोग




श्रीमद्भगवद्गीता की नज़र से हम सांख्ययोग को समझेगें. इस बात को शुरू करने से पहले मैं आपको कुछ बाते बताना चाहता हूँ.

योग क्यां है?

पुरुष क्यां है?

प्रकृति क्यां है?

कर्मयोग क्यां है?

प्रकृति के तीन गुण क्यां है?

ईश्वर से या खुद के वास्तविक स्वरुप को समझना और जानना और खुद को उससे जोड़ देना ही योग है.
पुरुष वो है जो इन्द्रियों के माध्यम से प्रकृति में उपलब्ध पदार्थो को भोगता है.

इन्द्रियां – नेत्र, नाक, जीभ, कान, स्पर्श (त्वचा) और इनके जो विषय है – रूप-रंग, गंध, स्वाद, श्रवण और स्पर्श.
प्रकृति क्यां है – हमारे चारो और का वातावरण जिसमे पदार्थ है, गुण है और यह ऐसी ताक़त है जो हमारे मन से जुड़ कर बहुत से खेल खेलती है. इसके पास तीन गुण है – सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण

इन्द्रियां प्रकृति में उपलब्ध विषय वस्तु हमारे मन के सामने प्रस्तुत करती है और हमारा मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है वो तत्क्षण ग्रहण होने लग जाता है और मन उस इन्द्रिय की विषय वस्तु के साथ आसक्ति पैदा करता है. मन बुद्धि को काबू में करता है और बुद्धि फिर आत्मा को यानि हमारे होने को एक तरीके से हर लेती है.

अब बात आती है की कर्मयोग क्यां है?

हमारे द्वारा किया गया कोई भी कार्य कर्म कहलाता है. हमारे हर कर्म को प्रकृति हर वक़्त ग्रहण कर रही है और वो उस कर्म के गुण के हिसाब से उसका फल हमें देती है. यानि यह प्रकृति का कार्य है फल देना.

आज विज्ञानं और आज के मॉडर्न साइकोलोजिस्ट, लेखक भी यही कहते है कि जब भी आप कोई ईच्छा करते हो तो यह सारा का सारा यूनिवर्स उसे फलित करने के लिए लग जाता है.

हम यदि आसक्ति के साथ कर्म करेगे तो फल मिलेगा ही यह नियम है प्रकृति का. बुरे कर्म का फल बुरा और अच्छे कर्म का फल अच्छा. यह नियम है प्रकृति का.

जन्म दर जन्म यह सिलसिला चलता रहेगा. और यह सिस्टम इस तरह का है कि हम इस प्रकृति में रहते हुए बिना कर्म के रह ही नहीं सकते यानि कर्म तो हमें करना ही पड़ेगा. अब कर्म करना पड़ेगा तो फल भी प्रकृति देगी ही क्यूंकि यह भी नियम है. इस तरह तो हम कभी निकल ही नहीं पाएंगे. कभी भी नहीं.

चिन्तन-मनन करने वाले ऋषियों ने चिन्तन किया मनन किया इस सिस्टम को समझा और एक बात उसमे पाई कि अगर कर्म होगा तो फल मिलेगा ही; पर फल उसे मिलता है जो फल की ईच्छा करके कर्म करता है. यानि अगर कर्म को ही इस प्रकृति को समर्पित कर दिया जाये या ईश्वर को समर्पित कर दिया जाये तो फल ईश्वर को या फिर प्रकृति को ही मिलेगा. इस तरह से हम कर्मफल से बच सकते है और जन्म-मृत्यु के चक्र से निकल कर अपने वास्तविक स्वरुप को प्राप्त हो सकते है. इसी तरीके को कर्मयोग कहा गया है कि हम जो भी कर्म करे वो कर्म ही ईश्वर को समर्पित कर दे.

यही श्री कृष्ण ने श्रीमदभगवद्गीता में अर्जुन से कहा कि - तेरा कर्म करने में अधिकार है उसके फलो में कभी नहीं.  इसलिए तो सभी कर्मो को मुझ ईश्वर में समर्पित करता हुआ युद्ध कर इस प्रकार से युद्ध करता हुआ भी तू पाप और पुण्य न प्राप्त होकर मुझ परमेश्वर को ही प्राप्त होगा.

अब हमारा विषय है सांख्ययोग. कर्म योग तो हो गया कि अपने सभी कर्मो को ईश्वर को समर्पित करते हुए कर्म करना. इसमें कोई भी कर्म करते हुए बस ईश्वर को याद रखना होता है. यानि निरंतर चिंतन. निरंतन चिंतन का मतलब होता है कि बिना किसी और सोच के एकमात्र ईश्वर का ही चिंतन करना.

श्रीमदभगवद्गीता में एक शलोक आता है – अध्याय 3 श्लोक 5

निसन्देह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता; क्यूंकि सारा मनुष्यसमुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है.

यानि हम कर्म नहीं करेंगे तो भी प्रकृति हमसे अपने आप ही करवा लेगी.

फिर एक श्लोक आता है कि - अध्याय 3 श्लोक 33

सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते है अथार्त अपने स्वभाव के परवश हुए कर्म करते है. ज्ञानवान भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है. फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा.

फिर गीता के अंत में 18वें अध्याय के श्लोक 49 कुल श्लोक 78 है

जो तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मान रहा है कि ‘मैं युद्ध नहीं करुगा’ तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है; क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्ध में लगा देगा.   

हमारे चित में जो संस्कार या Mental Patterns पड़े हुए है उन्ही से हम डायरेक्शन लेते है और प्रकृति भी उन्ही के अनुसार अपने आप ही हमें चलाती है.

अब बात यह हुई कि – हमारे में चित में संस्कार पड़े हुए है जो हमारे पूर्व कर्मो से संचित हुए है. हम अपने Subconscious  mind से अपने आप ही उन Mental Patterns के अनुसार अपने जीवन वो वो सब कुछ करते है जो हमारे चित में दर्ज है. क्यूंकि प्रकृति अपने आप ही वैसा करवाती है.

अब चित में Mental Patterns है प्रकृति में उन्हें पूरा करवाने की क्षमता है. हम चाहे या न चाहे तो भी प्रकृति करवा ही लेगी. अब अगर हम स्वयं को निकाल ले तो भी तो यह प्रोसेस होगा ही. स्वयं को निकलने का मतलब है की हम बस साक्षी रहे कि किस तरह से मेरे ही चित से Mental Patterns Observe करके प्रकृति अपने तीन गुणों द्वारा Materialize कर रही है, मैं कुछ भी नहीं कर रहा हूँ. कोई भी ईच्छा नहीं, कोई भी प्रयास नहीं कुछ भी करने में. बस मैं देख रहा हूँ और प्रकृति कर रही है. अब तरह से आप संचित कर्मो को neutralize होते देख रहे है, just watching, कोई भी नया कर्म नही कर रहे है – बस इसे ही सम्ख्यायोग कहते है.

मैं कुछ नहीं करता प्रकृति कर रही है अपने गुणों के द्वारा और प्रकृति ही करवा रही है – सांख्ययोग कहलाता है.

अब कर्म होगा ही नहीं और न फल मिलेगा. कोई ईच्छा नहीं होगी, कोई लगाव नहीं होगा. न ही कर्मयोग की तरह ईश्वर को कर्म अर्पण होंगे. कुछ भी नहीं बस देखना है लिप्त तो होना ही नहीं है. सांख्ययोग हो जायेगा.  



Tuesday, 6 March 2018

नाद योग – मेरी नज़र से





नाद शब्द का क्या मतलब है शब्दकोश में – नाद का शाब्दिक अर्थ है शब्द ध्वनि – वो आवाज़ जो शब्द से पैदा हो रही हो. इसका एक मतलब और भी बताया गया है कि अव्यक्त शब्द की ध्वनि. यानि ध्वनि तो है पर उसे कौन कर रहा है? कहा से आ रही है – पता नहीं है. इसलिए इसे अनहद नाद भी कहते है.

यह एक ऐसी ध्वनि है जो किसी इंसान के द्वारा पैदा की गयी नहीं है. क्यूंकि कोई भी आवाज़ उठती है, बढती है और फिर कम होते होते ख़त्म हो जाती है. या फिर कोई भी आजाज तब तक रहती है जब तक उसे पैदा करने वाला सोर्स उसे produce करता रहे या भेजता रहे.

पर अनहद नाद के साथ ऐसा नहीं है. एक ध्वनि जो है, और जो चल रही है, सदा से, सदा ही, अब भी है, तब भी थी. कभी न तो कम हुई और न ही बंद हुई. बाहर की आवाजो से अगर ध्यान हटा ले तो वो ध्वनि शुरू हो जाती है. शब्द की आवाज़. शब्द से तरंगे और तरंगो से यह नाद ध्वनि.

बड़ी ही विचित्र बात है कि हर वक़्त नाद बिना किसी के द्वारा पैदा किये बजता ही रहता है. मेरे अन्दर, आपके अंदर हर वक़्त यह ध्वनि चल रही है, बज रही है और हम कभी भी इसे सुन सकते है, कभी भी, कोई समय नहीं है इसका. जबकि हमारे अंदर कोई भी तो नहीं बैठा जो इस ध्वनि को बजा रहा हो. फिर भी बज रही है.

जैसे ही शोरगुल से दूर थोड़ी से शांत स्थान पर पहुचे और दोनों कानो को बंद कर ले तो आप इस ध्वनि का आनंद ले सकते है. आनदं – जी हा आनंद ले सकते है. आप सोच रहे होगे कि अंदर आती हुई ध्वनि आनंद कैसे दे सकती है. दे सकती है बिलकुल दे सकती है. यह आपके अन्दर आती हुई ध्वनि तुरंत शांति देती है आनंद देती है.

मन को चारो ओर से हटा कर अपने अन्दर लगाया जाये और थोड़ी देर के लिए उसे चुप करवा दिया जाये और इस अंदर आती हुई ध्वनि पर लगा दिया जाये तो उसी वक़्त शांति आ जाती है. मन शांत हो जाता है. आपको एक बार अपने मन को उस ध्वनि पर लगाना है फिर धीरे धीरे नाद अपने आप ही आपको खीच लेगा.

नाद तो हर वक़्त चल ही रहा है. वो मेरे पास है हर वक़्त पर मैं ही दूर हूँ उससे. नाद से, इसी नाद से जो हम सब के अंदर बज रहा है – ईश्वर तक पंहुचा जा सकता है. जैसे कि कोई मशीन चल रही हो और उसकी आवाज़ हमारे कानो में आ रही हो – तो हम उस आवाज़ को फॉलो करते करते उस मशीन तक पहुच जाते है. विश्व शक्ति इस विश्व को चला रही है – विश्व शक्ति वो मशीन है जो इस यूनिवर्स को बना रही है हर पल, हर वक़्त और उस से जो आवाज़ पैदा हो रही है वो नाद है.  इसलिए ही नाद योग की बात आई है – यानि इस आवाज़ को फॉलो करते करते एक दिन उस तक पहुच जायेगे जिसकी वजह से यह आवाज़ आ रही है. 

गुरु नानक ने इस नाद को इक ओंकार कहा, हिन्दू धर्म ने इसे ॐ कहा और अलग अलग धर्मो ने इसे अलग अलग नाम दिया. नाद चल रहा है और चल्र रहा था. आपको खुद देखना होगा. खुद समझना होगा. थोड़ी देर किस भी शांत स्थान पर, शोरगुल से अलग थोड़ी देर के लिए बैठ जाईये अपने कानो की tragus को press करके कानो को बंद कर लीजिये. ध्यान को अंदर आती हुई आवाजों पर लेकर जाईये.

कई आवाज़े सुनाई देंगी पर आपको अपना ध्यान सबसे तेज़ आती हुई आवाज़ पर लेकर जाना है और उसे सुनना है बस. जो सबसे पहली आवाज़ आपको सुनाई देगी वो झींगुर जैसे आवाज़ करता है या फिर मधुमक्खी जैसी आवाज़ करती है - वैसी आवाज़ होगी. जैसे जैसे आप अपने मन को इस आवाज़ पर बनाये रखेगे तो आप हैरान होंगे कि यह ध्वनि धीरे धीरे बांसुरी की आवाज़ में बदलनी शुरू हो जाएगी. आपको अपने आप ही बिना बांसुरी सुने बांसुरी कि आवाज़ सुनाई देगी. हर पल हर वक़्त. और मज़े की बात कि न तो यह बांसुरी कि आवाज़ कभी कम होगी न ही इसकी फ्रीक्वेंसी में कोई कमी आएगी. हर वक़्त एक सार.

फिर बांसुरी की आवाज़ पर ध्यान लगाना होगा यह ध्वनि भी बदलनी शुरू हो जाएगी यह आवाज़ वीणा की आवाज़ में बदल जाएगी. फिर इस पर ध्यान लगाना होगा. इस ध्वनि को साधना होगा. मन को जोड़ना होगा इस आवाज़ पर. हमारी यात्रा ॐ कि पवित्र ध्वनि तक पहुचने की है. इस बीच आपका व्यक्तित्व भी बदलना शुरू हो जायेगा और आपके चारो ओर का संसार भी.

फिर ढोल जैसी ध्वनि, फिर शंख जैसी ध्वनि, फिर मंदिर की घंटियाँ, फिर समुद्र की लहरें, फिर ॐ. ॐ तक पहुचते पहुचते सब कुछ बदल जायेगा, सब कुछ. मंदिर में, चर्च में घंटियाँ इसीलिए है. आपको बताने के लिए कि यह आवाज़ आपके अन्दर है.

मन को टिकाना होगा हर आवाज़ पर, गहरे उतरना होगा हर आवाज़ में तभी अगले पड़ाव पर पहुच पायेगे. बहुत सारी शक्तियां भी विकसित होगी आपके अंदर इस बीच. पर कही भी उलझना नहीं है. आगे बढ़ते रहना है. इस साधना में मन सारा दिन शांत रहता है. और शांत मन जीवन के हर आयाम के लिए उत्तम होता है.

इस साधना में आगे मन नाद के प्रति सजग हो जाता है और जब भी आप शांत स्थान में जायेगे तो नाद सुनाई देने लगेगा. जब ऐसा होने लगे तो समझ लेना कि आपका मन आपकी साधना में साथ देने लगा है. केवल इतना करने से जीवन आसान लगने लगेगा. 

मन में अच्छे विचार उठेगे. किसी भी ऐसी जगह पर जाओ जहाँ कोई साधना करता हो तो भी आपका नाद बजने लगेगा. जहाँ बहुत ज्यादा ध्यान होता होगा जैसे कि काफी आश्रमों में होता है वहा जाते ही नाद अपने आप ही बजने लगेगा और बजता ही रहेगा. इस तरह से यह भी पता चल जाता है कि जहा आप गए है वह ध्यान होता भी है या नहीं.

इस तरह से यदि कोई अच्छा ध्यान करने वाला साधक आपके सामने आएगा तो भी नाद बजने लगेगा. आपके पास से गुजर जायेगा तो भी नाद बजने लगेगा. ऐसा होता है सच में होता है. जैसे जैसे नाद साधना में आगे बढोगे तो हर जगह यह नाद ईश्वर के होने का आभास देगा. एक अच्छे साथी के रूप में नाद हमेशा आपके साथ रहेगा.

जिस शक्ति से ईश्वर इस दुनिया को बनाये हुए है नो नाद ही है. उसे माँ के विभिन्न रूप भी समझ सकते है, माँ दुर्गा, माँ काली, जगत जननी,  माँ मरियम, माँ गंगा, गायत्री माता, प्रकृति माँ, परा शक्ति. कोई भी रूप किसी भी धर्म के अनुसार. जब भी सृजन शक्ति कि बात होगी तो समझ लेना कि इसी शक्ति कि बात ही हो रही है.

जब नाद के मातृत्व रूप तक पहुच जाओगे तो जगत जननी माँ से कुछ भी मांग लेना वो मिलेगा. जब नाद से रूबरू होगे तो आपकी प्रार्थनाएं भी काम करने लगेगी. जब नाद से गहन नाता हो रहा होगा तो नाद से ही प्रार्थना करना, पूरी होने लग जाएगी. हमेशा दुसरो में लिए प्रार्थनाएं करते रहना आपको साधना में आगे लेकर जायेगा.


Monday, 5 March 2018

आत्मा – एक रहस्य



विज्ञानं बहुत तरक्की कर चुका है और कर भी रहा है. पर बहुत सारे अनसुलझे रहस्य अब भी वैसे के वैसे हमारे सामने खड़े है जैसे वो सदा से हमारे सामने रहे है. जिनका जवाब हमारे पास नहीं है. मन जिसे हम Mind भी कहते है उसको हम महसूस तो कर सकते है पर वो किस चीज का बना है यह आज तक न तो विज्ञानं बता पाया है, न दर्शन शाश्त्र, न धर्म और न ही अध्यात्मिक विज्ञानं. मन है, अवश्य है, हम सब का है पर वो असल में किस Material से बना है यह बात पता नहीं है.

वेदांत मन को Subtle Material से बना हुआ मानता है. पर वो सटल material क्या है इसके बारे में अधिक जानकारी नहीं देता. मतलब की हमारा mind जो है वो एक material है. और यही बात आज एक material साइंटिस्ट ने भी कही है – उन्होंने कहा है mind के बारे मी सोचने के लिए हमें किसी नए ऐसे material के बारे में सोचना होगा जो बिलकुल ही अलग हो, यानि एक ऐसा तत्व जिसके बारे में आजतक सोचा ही न गया हो.

मैं कौन हूँ? यह संसार क्यां है? यह संसार क्यूँ है? कुछ यह Fundamental Questions है जिनपर वेदांत विचार करने को कहता है. वेदांत यह भी कहता है कि बिना विचार किये हम आगे बढ़ ही नहीं सकते. यही विचार ही वो व्हीकल है जिसपर बैठ कर हम इस क्षेत्र में आगे बढ़ सकते है.

मैं कौन हूँ, इस से पहले मैं इस बारे में बताना चाहता हूँ कि मैं हूँ – मैं अपने बारे में कहू तो मैंने इस प्रश्न पर बहुत ही विचार किया कि मैं हूँ – मैं तू हूँ ही जैसे कि आप है ही – पर मैं इस दुनियां की किस वस्तु से मेल खाता हूँ – हम ऐसे ही तो समझते है वस्तुओं को तुलना करके – यह वस्तु कपडे से बनी हुई है, यह लोहे से बनी हुई है – यह सोने से बनी हुई है – ब्ला, ब्ला, ब्ला. पर वस्तुओं को मैं इस तरह के मिलान से समझ सकता है. पर अभी तक मुझे इस दुनियां में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं मिली जिसे मैं यह कह सकू कि हाँ यह मुझ से मिलती जुलती है – मैं इस वस्तु कि तरह ही हूँ. ऐसा नहीं हुआ आज तक नहीं हुआ. मैं हूँ यह मैं समझ सकता हूँ.

फिर बात आती है कि मैं एक शरीर ही तो हूँ – पर यह बात भी तर्क से ही ख़त्म हो जाती है. शरीर मेरा Real Nature नहीं है. जब मैं जागृत होता हूँ तो इस शरीर में माध्यम से इस संसार को तोलता हूँ. फिर स्वप्न अवस्था में यह शरीर सोया होता है पर मैं फिर भी स्वप्न में अपने शरीर को और अन्य लोगो को, वस्तुओं को सब कुछ करते देखता हूँ जबकि मेरा शरीर सोया होता है – तो फिर जो स्वप्न में होता है वो कैसे Create हो जाता है उसे कौन Create करता है – क्यां मैं?

फिर एक और भी अवस्था आती है जिसे आम भाषा में हम गहरी नींद कि अवस्था कहते है Dreamless स्टेट. जब ड्रीम्स भी नहीं आते. बस इस अवस्था का अहसास होता है कि मैं आज गहरी नींद में सोया. क्यूंकि तब ड्रीम्स भी नहीं होते और जाग्रति भी नहीं होती तो क्या होता है उसका कुछ भी पता ही नहीं चल पाता.

हम सभी इन तीन अवस्थाओं से हम हर रोज़ गुजरते है. अब इस बात को कैसे माने कि इन तीनो अवस्थाओं मे से किस एक अवस्था को हम सच माने कि क्या जागृत अवस्था सच है? फिर स्वप्न में जो होता है वो क्या है? और फिर Dreamless State में जो होता है वो क्या है?

फिर मैं अपनी तुलना करना शुरू करू तो मैं न तो अपनी जागृत अवस्था से मेल खाता हूँ, न ही स्वप्न अवस्था से और नहीं ही Dreamless अवस्था से. इन तीनो अवस्थाओं को मैं एन्जॉय कर रहा हूँ पर इन तीनो में से मैं कोई भी नहीं हूँ?

फिर मैं क्या हूँ? शरीर नहीं, कोई भी एलिमेंट नहीं, मन भी नहीं, बुद्धि भी नहीं, फिर क्यां? मैं सच में इन चीजो से मेल नहीं खाता आप भी नहीं खाते मेल. पर मैं जो हूँ वो मैं हूँ – गीता ने, वेदांत ने एक अलग कांसेप्ट दे दिया – आत्मा. मैं जो हूँ – एक आत्मा हूँ. अब मैं यह नहीं कहुगा कि मैं जो हूँ - वो मैं हूँ. मैं जो हूँ – एक आत्मा हूँ.

आत्मा एक ऐसी शक्ति जिसे इस दुनियां कि किसी भी वस्तु से match नहीं किया जा सकता है. आप खुद को match कर ही नहीं सकते किसी भी वस्स्तु से. वो Distinct है बिलकुल Distinct. न उसे जलाया जा सकता है, न सुखाया जा सकता है, न गलाया जा सकता है, न उसे काटा जा सकता है, न वो टूट सकती है.

और रहस्य की बात कि मैं इस मन से उसके बारे में सोच भी नहीं सकता. पर कब तक सोच नहीं सकता जब तक मैं Self Realized नहीं हूँ. पर मैं फिर भी जान सकता हूँ उसके बारे में. पर एक प्रॉब्लम है – एक और रहस्यमय प्रॉब्लम - वो यह की जब मैं उसके बारे में जनूगा तो मैं वही हो जाउगा. फिर मैं किस के बारे में जनुगा. तब तो जानने वाला और जनाने वाला दोनों एक ही हो जायेगे.

Friday, 2 March 2018

जीवन में तरक्की कैसे करें?



अगर मैं अध्यात्मिक जगत की बात करू तो जीवन में उन्नति का मतलब है कि स्वयं को जानना. लेकिन आध्यात्मिकता यह भी नहीं सिखाती कि भौतिक जीवन को छोड़ देना चाहिए. छोड़ना चाहिए भी नहीं और छोड़ना है भी नहीं.

मेरे चैनल से जुड़े हुए बहुत से दोस्तों के फ़ोन आते है कि कही मैं अध्यात्मिक हो गया तो मेरा घर-बार तो नहीं छूट जायेगा, कही मैं जिंदगी से तो नहीं कट जाउगा. सबसे ज्यादा जो मेरे पास प्रश्न आता है वो यह कि – मैं शादीशुदा हूँ, कही मेरे वैवाहिक जीवन का इसका बुरा असर नहीं पड़ेगा. या फिर यह प्रश्न आता है कि मैं ग्रस्थ जीवन में रहते हुए साधना कैसे कर सकता हूँ.

देखिये आध्यात्मिकता से जीवन और अधिक बारीकी से समझ आने लगता है. आप हमेशा शांत अनुभव करते है और समझ शक्ति बढ़ने लगती है. रिश्ते और वस्तुएं पहले से अधिक अच्छे से समझ आने लगती है तो फिर ऐसे में घर कैसे छूटेगा और वैवाहिक जीवन में प्रॉब्लम कैसे आएगी. मेरे अनुभव से तो व्यक्ति अध्यात्मिक शक्तियों से जीवन को और अधिक अच्छे से गुजार सकता है.
एक बात मैं और आपको बता दूँ कि हमारे जितने भी ऋषि हुए है उनमे से अधिकांश शादीशुदा थे. उन्होंने गृस्थ रह्ते हुए ही साधना की और ईश्वर प्राप्ति भी की.

तो आध्यात्मिकता इतना कुछ दे देती है कि मुश्किल से मुश्किल प्रॉब्लम भी आसान सी लगने लगती है. एकाग्रता का सफलता से सीधा सम्बन्ध है. सफलता के लिए आपको एकाग्रता तो चाहिए ही. आप किसी भी फील्ड से है स्टूडेंट है, जॉब करते है, प्रोफेशनल है, बिज़नस कर रहे है, दूकान चल रहे है, हाउसवाइफ है. क्यां हर जगह काम करने के लिए एकाग्रता नहीं चाहिए.

जीवन में अगर उन्नति चहिये तो आधारभूत बातों को समझना होगा. मोटिवेशन की बड़ी बड़ी बाते सुन कर कुछ देर के लिए तो कुछ करने के लिए मन में लहरें उठती है पर वो धीरे धीरे बैठने लगती है. सच में वो लहरें ही होती है.

एकाग्रता को और एकाग्रता कि शक्ति को समझना होगा, फिर ईच्छा शक्ति को समझना होगा, समझ शक्ति को समझना होगा, मन को समझना होगा. मैं डरा नहीं रहा आपको; हकीकत बता रहा हूँ. मोटिवेशन थोड़ी देर के लिए उठाव लाती है यह बात मैं मानता हूँ. पर जीवन में आगे बढ़ने के लिए, उन्नति करने के लिए स्वयं को समझना होता है. अपनी पावर्स को समझना होता है.

एकाग्रता वो शक्ति है जो किसी भी कार्य को समझने के लिए एक जरूरी है. बिना एकाग्रता के आप कोई भी कार्य ठीक ढंग से नहीं कर सकते. एकाग्रता का मतलब है कि अपने मन को किसी भी एक कार्य में या फिर विचार पर लम्बे समय के लिए टिकाये रखना. क्यूंकि मनन भाग जाता है और हमें उस काम से हटा देता है जिसे हम कर रहे होते है.

एकाग्रता में एक और गुण है जो बहुत ही कम लोगो को पता है. मैं यह बात इस लिए कह रहा हूँ कि मैंने इस पर बहुत काम किया है. एकाग्रता रिलैक्सेशन लाती है. इसलिए आप ध्यान से देखना सफल लोगों के चेहरों को. वो टेंस नहीं दिखेंगे.

फिर बात आती है ईच्छा शक्ति की. इसकी शक्ति को समझ लिया तो जीवन में तरक्की करने से आपको कोई नहीं रोक पायेगा. जीवन में आगे बढ़ने से आपको कोई नहीं रोक पायेगा. सच में इतनी ताक़त है इस शक्ति में. यह ईच्छा शक्ति का चमत्कार ही है कि आज हम अंतरिक्ष में है, चाँद पर है, मंगल पर है.

ईच्छा शक्ति हर व्यक्ति के अंदर है, हम सबके अंदर है. पर दबी हुई है. हम उसे निकलना नहीं जानते और उसका प्रयोग भी करना नहीं जानते. ईच्छा शक्ति का मतलब है कि हमारी इच्छाओं में शक्ति छिपी हुई है. पर पहले एकाग्रता को बढ़ाना होगा. फिर ईच्छा शक्ति को.

ईच्छा शक्ति एक अध्यात्मिक शक्ति है. इसका अध्यात्मिक मतलब है कि यह प्रकृति हमारी हर ईच्छा पूरी करने में हमारी सहायता करती है. शर्त यह कि ईच्छा बलवती हो, यह न हो कि हर थोड़ी देर में या कुछ समय के अंदर ही हम अपना इरादा ही बदल दे. ऐसा करने वाले ईच्छा शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकते.

रहस्य – द सीक्रेट में रोंडा बर्न ने यही कहा कि आपकी जिंदगी में जो कुछ भी आता है, उसे आप अपने विचारो से ही आकर्षित करते हो। साथ ही, जो कुछ भी आप जिंदगी में चाहते हो, भले ही वह कितना भी बड़ा या छोटा क्यू न हो, आप उसे अपने विचारो की सहायता से हासिल कर सकते हो.

जिंदगी में खुद पर भरोसा करना और सपनों को पूरी करने की अनूठी कहानी है Alchemist- अल्केमिस्ट में पाउलो कोहेलो ने यही कहा, कि जब भी आप को ईच्छा करते है तो सारा का सारा यूनिवर्स उसे पूरी करने में लग जाता है.

फिर मैं बात करता हूँ समझ शक्ति की. इसे बुद्धि भी कहते है. हम अनजान रहते है इस शक्ति से. जब कि हम सब के अन्दर हर वक़्त यह शक्ति उपलब्ध रहती है. हम हमेशा एक बात कहते है कि काम करने का मन नहीं करता. थोडा ध्यान से सोचिये और देखिये कि मन आपको काम करने नहीं दे रहा. पर जब हम काम को टालते है कल, परसों या आगे तो हम ही टालते है. मेरे कहने का मतलब है कि किसी भी काम को तलने का फाइनल डिसिशन हमारा ही होता है हमारे मन का नहीं. अगर हम इस बात को समझ ले तो हम जीवन में हर काम करने लगेगे. क्यूंकि मन को वास्तव में हमारे अनुसार चलना होता है. यदि हम बुद्धि को बात मानते हुए और मन की बात न मानते हुए यदि काम को टालना बंद कर देंगे तो आप हैरान होंगे कि थोड़ी देर पहले जिस काम को करने का मन नहीं था अब मन अपने आप ही काम में लगने लगा है. ऐसा क्यों होता है इसका भी एक टेक्निकल रीज़न है – वो यह कि बुद्धि एक बार डिसिशन ले ले तो मन अपने आप ही उसके अनुसार कार्य करता है.

याद रखिये कि केवल अच्छी अच्छी बाते सुन कर हम सफलता कि ओर नहीं बढ़ सकते. हमें अगर जीवन में तरक्की करनी है तो खुद को और खुद कि शक्तियों को समझना होगा.

एकाग्रता को बढाने से बहुत सारा कार्य आसान हो जायेगा. पर आप बिना योग के एकाग्रता को नहीं बढ़ा सकते. योग से ही एकाग्रता को बड़ी ही आसानी से बढे जा सकता है. बहुत से तरीके है योग के पास, जो ही आपको अच्चा लगे चुन सकते है.