Tuesday, 17 April 2018

पतंजलि क्यां समझाना चाहते है?


पतंजलि क्यां समझाना चाहते है.


यह जो कुछ भी हमें अपने चारो और दिखाई दे रहा है वो प्रकृति है. पतंजलि योग सूत्र कहता है कि प्रकृति और पुरुष दोनों भिन्न भिन्न तत्व है और दोनों ही अनादि है. प्रकृति जड़ है और पुरुष चेतन है. जैसे ही इन दोनों का मिलन होता है तो प्रकृति में हलचल पैदा हो जाती है और सृष्टी निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है.

योग भारतीय दर्शन का एक स्कूल है. भारतीय योग दर्शन. और भी कई स्कूल है भारतीय दर्शन में और हर स्कूल को अपनी अपनी विशेषताए है. सबने अपनी अपनी बात कही है. परन्तु पतंजलि ने एक तरह से एक प्रैक्टिकल एप्लीकेशन दी है.

प्रकृति दृश्य है और पुरुष दृष्टा है, देखने वाला है. इस सृष्टि में हर जगह प्रकृति ही दिखाई  देती है और जो इसे देख रहा है वो नहीं दिखाई देता जबकि इस प्रकृति का सम्पूर्ण कार्य उस चेतना की वजह से ही हो रहा है. दोनों प्रकृति और पुरुष इस प्रकार से मिल गए है कि ठीक से पहचानना मुश्किल हो गया है. अब जो जीव है वो इन दोनो के संयोग का परिणाम है. हम सब जीव है, मैं, आप हम सब. यह चेतन पुरुष ही जीव में आत्मा और सृष्टि में विश्वात्मा है.

प्रकृति जड़ है लेकिन जीव विश्वात्मा का अंश होने के कारण चेतन है. आत्मा जड़ प्रकृति से बिलकुल मेल नहीं खाती क्यूंकि वो प्रकृति ने आत्मा को नहीं बनाया. प्रकृति त्रिगुणात्मक है. सत्व, रज और तम यह तीन प्रकृति के गुण है जबकि आत्मा गुणातीत है. प्रकृति में पदार्थ है जबकि आत्मा इस प्रकृति के किसी भी पदार्थ का हिस्सा नहीं है.

लेकिन जीव ने मन के कारण अपने आपको इस प्रकृति से ही जोड़ लिया है. क्यूंकि शरीर प्रकृति जनित है इसलिए जीव को लगता है कि प्रकृति ही उसका लक्ष्य है. प्रकृति में उपलब्ध पदार्थ ही उसका लक्ष्य है. यानि कि जीव खुद को शरीर समझ बैठा है कि मैं शरीर हूँ. जबकि समझा मन रहा है कि तुम शरीर हो और जो दिखाई दे रहा है वही सच है.

दुःख और सुख दोनों प्रकृति द्वारा पैदा किये गए है. दुखी और सुखी होने का कारण हमारा खुद का जुडाव है प्रकृति से. बीच में जो मन है उसके कारण जुडाव है. क्यूंकि हम खुद को केवल शरीर ही मान रहे है तो हर वस्तु से हम अपना वास्ता कर लेते है जबकि हमारा वास्तविक स्वरुप अलग है. विज्ञानं के अनुसार भी एक जैसे गुणों वाले पदार्थो का मिलन होता है विजातीय गुणों वाले पदार्थो का नहीं.

हम दुःख से बच सकते है पर इसके साथ हमें सुख को भी छोड़ना होगा. केवल दुःख को छोड़ कर बात नहीं बन सकती. छोड़ना होगा तो दोनों को छोड़ना होगा. सुख को भी और दुःख को भी. दोनों को बड़े ही आराम से छोड़ा भी जा सकता है. अगर हम अपने असली स्वरुप को जान ले तो. इसके लिए जो बीच की कड़ी है, हमारा मन, उसे दुरुस्त करना होगा.

इसी का नाम ही योग है. सुख और दुःख को छोड़ना और पाने असली स्वरुप को जान कर उससे जुड़ना. योग वास्तव में जुड़ने को ही कहते है. 

तीन बाते है – कि
मैं खुद को शरीर समझ लूँ.
मैं खुद को मन समझ लूँ.
या फिर मैं खुद को आत्मा समझ लूँ.

अगर खुद मैं खुद को शरीर समझता हूँ तो क्या होगा

तो मैं एक तरह से शरीर के माध्यम से एक भोक्ता होउगा. शरीर को जो जो महसूस होगा वो वो मुझे महसूस होगा. मुझे अपने अस्तित्व का डर लगेगा क्यूंकि यह बात तो पक्की है कि शरीर ने मरना है. मैं सुख को भी भोगुगा, बिमारियों को भी भोगुगा, हर उस भाव के साथ मेरा सम्बन्ध होगा जो शरीर से जुड़ा हुआ है और शरीर के कारण है. और इस जुडाव से कभी भी नहीं निकल पाउगा. जन्म बीत जायेंगे परन्तु मैं शरीर ही रहूगा.

अब अगर मैं यह मानना शुरू कर दूँ कि मैं शरीर नहीं मन हूँ – तो क्यां होगा

मुझे मन के विकारो को भी भोगना पड़ेगा. मेरा मन ही decide करेगा कि यह सुख है और यह दुःख है और मुझे वो मानना ही पड़ेगा. मैं मानुगा ही क्यूंकि मैं मन ही तो होउगा. मन में उठने वाला हर विचार के तहत इधर उधर भागना मेरी मज़बूरी होगी. फिर मन प्रकृति के तीन गुणों और अपने विकारो के साथ मुझे जैसा चाहेगा चलाएगा.

अब अगर मैं यह मान लूँ की मैं एक आत्मा हूँ – तो क्यां होगा

देखिये मन जो है वो शरीर से अलग है बिलकुल अलग. मन से हर वस्तु को समझा जा सकता है पर मन कोई भी वस्तु नहीं है. इस तरह से आत्मा शरीर से तो अलग है ही परन्तु मन से भी बिलकुल अलग है. जैसे मन दुनियां की किसी भी वस्तु से मेल नहीं खाता ठीक वैसे आत्मा मन से भी मेल नहीं खाती. वो शक्ति जो शरीर मन और प्रकृति को चला रही है. पर वो शक्ति न तो शरीर है, बा मन है, न प्रकृति है और उसे शब्दों में बयाँ किया ही नहीं जा सकता. तो अब होगा क्यां मेरी यात्रा का टारगेट ही बदल जायेगा. केवल अध्यात्मिक यात्रा का लक्ष्य ही नहीं बल्कि भौतिक जीवन यात्रा का लक्ष्य भी बदल जायेगा. मैं क्यूँ उसके लिए कार्य करुगा जो मैं हूँ ही नहीं यानि शरीर के लिए.

इस तरह से पतंजलि निकाल कर लेकर जाना चाहते है. उनके पास निकलने का तरीका भी है जिसे उन्होंने योग दर्शन का नाम दिया है. हर बात को उन्होंने समझा, हर बात को उन्होंने परखा और यह भी देखा कि इस यात्रा में क्यां क्यां प्रोब्लेम्स आएगी और उनका निदान क्या होगा. सब कुछ दिया महर्षि पतंजलि ने.

पतंजलि योग केवल योग आसन नहीं है. केवल प्राणायाम नहीं है. वास्तव में जो दीखता है वो है नहीं और जो है वो दिखता नहीं है. वही पतंजलि दिखाना चाहते है; जो है पर दीखता नहीं है.

मुझे आगे आपसे पतंजलि योग सूत्र पर बात करनी है

चक्रों में छिपी है रहस्यमयी शक्तियां




जैसा कि आप सब जानते है कि इन्सान में यानि Human Instrument में मोटे तौर पर 7 चक्र होते है.

मूलाधार
स्वधिस्थान
मणिपुर
अनाहत
विशुद्धि
आज्ञा
सहस्त्रार

मैं आपको विशेषतौर पर 6 चक्रों के बारे में ही बताउगा और उनसे जुडी हुई रहस्यमयी बातें भी बताउगा. हर चक्र की अपनी एक विशेषता है, अपने गुण है. जब चक्र में सही उर्जा होती है तो उस से सबंधित सभी गुण व्यक्तित्व में उभर कर सामने आते है और यदि चक्र की उर्जा में कमी आ जाये तो उस से सम्बंधित रोग इत्यादि भी शरीर और मन में उभर कर सामने आते है.

किसी भी व्यक्ति में कोई विशेष गुण है; मैं उन गुणों की बात कर रहा हूँ जो जन्मजात होते है. कोई भी विशेष गुण सबंधित चक्र के कारण ही होता है. जैसे कि कोई बहुत ही अच्छा आर्टिस्ट है, पेंटर है, गायक है, कुक है, डांसर है, अभिनेता है, अभिनेत्री है. कोई भी ऐसी कला जिससे जनमानस को मंत्रमुग्ध किया जा सकता हो वो अनाहत चक्र के सही उर्जावान होने पर आती है.

अब हर किसी में तो जन्मजात गुण होते नहीं है और यदि आप अपने जीवन में ऐसी कोई विलक्षण प्रतिभा चाहते है तो अनाहत चक्र को एक्टिवेट करके वो प्रतिभा हांसिल कर सकते है. मन बहुत सारी इच्छाओं से भरा हुआ है, हर किसी के मन में कुछ कर दिखाने की ईच्छा छिपी रहती है परन्तु व्यक्तित्व में वो प्रतिभा उपलब्ध न होने के कारण हम अपनी ईच्छाओं को मन में ही मार देते है.

परन्तु मैं जो बता रहा हूँ वो बिलकुल अलग तरीका है. रहस्यमयी है, विलक्षण है और व्यवाहरिक भी है. आपका मन है कि इस दुनियां में आप कुछ करके जाये तो; दो चक्रों पर ध्यान कीजिये – मणिपुर चक्र और अनाहत चक्र. यक़ीनन आप अपना मुकाम हांसिल कर लेंगे. आप हैरान होंगे कि अपने आप ही आपके अन्दर क्रिएटिव विचारो का सृजन होने लगेगा और आपको लगेगा कि आप कुछ भी कर सकते है और यह सब आपको अपने अंदर से अपने आप ही महसूस होगा.

ऐसे ही यदि आप ज्ञानवान होना चाहते है वो भी इस तरह से कि आपको अपने आप ही हर बात का पता चल जाये. All Knowing ability तो आप फिर दो चक्रों पर ध्यान कीजिये – मणिपुर और विशुद्धि चक्र. विशुद्धि चक्र एक्टिव होने से ज्ञान अपने आप ही मन में उभरने लगता है. जब ऐसा होगा तो आप हैरान होंगे कि जो आपके मन में उभर रहा है वही ज्ञान की किताबो में लिखा हुआ है. वेदों में, उपनिषदों में, गीता में, विज्ञानं में.

ऐसे ही यदि आप अनोखे अनुभव चाहते है तो और शरीर से अलग कुछ अनोखा अनुभव चाहते है तो आप आज्ञा चक्र पर ध्यान कीजिये. आपको नित नए अनुभव होंगे. कभी आनंद का अनुभव, कभी अनोखी खुशबु का अनुभव, खुशबु इतनी अनोखी कि ऐसी खुशबु आपने कभी अनुभव की ही नहीं होगी और इसे केवल और केवल आप ही अबुभाव कर रहे होंगे. आपके साथ यदि हज़ार व्यक्ति भी है तो भी आप अकेले उस खुशबु का आनंद उठा रहे होंगे.

बहुत सारी रहस्यमयी शक्तियां भी आपके पास अपने आप चल कर आ जाती है. ऐसी शक्तियां जिनके बारे में आपने कभी सोचा ही नहीं होगा. जैसे की कोई आपके पास आता है तो आपको उसकी भावनाओ के पता चल जायेगा. कही नेगेटिव उर्जा होगी तो उसका तुरंत पता चल जायेगा. कही पॉजिटिव उर्जा होगी तो उसका भी अपने आप ही पता चल जायेगा. बहुत सारी घटनाओं का पहले से ही आभास हो जायेगा.

आज सफलता हर किसी की जरुरत है. आज धन, पैसा हर किसी की जरुरत है. पर कई बार हालात ऐसे हो जाते है कि कुछ समझ में आता नहीं है. ऐसे में अध्यातम आपका मित्र बन कर आपके साथ खड़ा होता है. कुछ खास बात है अध्यात्म में जो आपको मुश्किल हालातो से निकलने में मदद कर सकती है. अगर इस तरह के हालात जीवन में आ जाये तो मणिपुर चक्र पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान करना चाहिए.


संध्या साधना बदल सकती है आपकी किस्मत


संध्या साधना बदल सकती है आपकी किस्मत


हिन्दू धर्म में संध्यावंदन का विशेष महत्व है जिसका वर्णन हमारे पुराणों में, हमारे वदो में किया गया है. खासतौर पर शिवस्वरोदय नामक शाश्त्र में जिस शाश्त्र की मदद से मैं आपको संध्या साधना का खास मतलब बताने वाला हूँ.

संध्यावंदन में दिन में तीन बार पाठ किया जाता है। एक सूर्योदय के दौरान (जब रात्रि से दिन निकलता है), अगला दोपहर के दौरान (जब आरोही सूर्य से अवरोही सूर्य में संक्रमण होता है) और सूर्यास्त के दौरान (जब दिन के बाद रात आती है).

प्रातःकाल सध्या को प्रातःसंध्या या प्रभात और दोपहर की वंदना को मध्याह्निक सध्यां और सायंकाल में सायंसंध्या. तो इस तरह दिन में तीन बार संध्या की जाती है.

अब बात यह है कि संध्या में ऐसी क्या खास बात है कि इस समय की गयी साधना सबसे ज्यादा फलित होती है. और  इस वक़्त की गयी प्रार्थना आपकी किस्मत बदल सकती है.

मैंने आपको शिवस्वरोदय शाश्त्र के बारे में बताया है जिसका सम्बन्ध हर पल चलने वाले और बदलने वाले स्वर से है. भारतीय दर्शन क अनुसार हमारे शरीर में कोई 72000 नाड़ियां है और उन 72000 में से तीन नाड़ियां सबसे इम्पोर्टेन्ट है और उन तीन में से सबसे इम्पोर्टेन्ट जो है वो है सुष्मना नाड़ी.

ऐसे ही हमारा मानव शरीर पांच तत्वों से मिल कर बना है. यह है पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश. अध्यात्मिक दृष्टि से जो सबसे ज्यादा इम्पोर्टेन्ट है वो है आकाश तत्व. और नाड़ी और तत्वों का जो सबसे अनूठा संगम है वो है सुष्मना नाड़ी हो और आकाश तत्व हो.

अब मज़े की बात यह है कि जब संध्या का समय होता है तो सबसे ज्यादा Chances होते है सुष्मना नाड़ी के साथ आकाश तत्व होने के. Automatically ऐसा होता है संध्या के समय. और यह वो कॉम्बिनेशन है जब हम ईश्वर के बहुत करीब पहुच जाते है. परन्तु ऐसा कुछ पलो के लिए ही होता है. यदि हम इन पलो को पकड़ना सीख ले या सजग होकर उन पलों  में कोई भी ईच्छा करे तो वो ईच्छा अवश्य पूरी होती है.

परन्तु उसके लिए सजग रहना होगा, यह पल आते है, हर रोज़ आते है और किसी भी संध्या में आ सकते है, सुबह, दोपहर या शाम कभी भी. आपको सजग रहना होगा उन पलों  के लिए.

ऐसा कहा जाता है कि यह एस पल होते है जिस समय हम ईश्वर के बेहद नजदीक पहुच जाते है और इस वक़्त कुछ भी माँगा जाये वो मिलता है. भौतिक हो या अध्यात्मिक कुछ भी अगर मांगेगे वो मिलेगा ही.

अब बात यह है कि हर वक़्त तो हम सजग होते नहीं है क्यूंकि हमारा मन होने नहीं देता है. परन्तु क काम हम कर सकते है वो यह की हम तीनो समय संध्या करे. यह वो समय है जब रात सुबह में बदल रही होती है और जब दोपहर को सूर्य दिशा बदल रहा होता है और जब दिन रात मी बदल रही होती है.

इन तीन संध्या कालो में प्रार्थना करने का नियम बना लीजिये. और जो आप अपने जीवन से चाहते है भौतिक हो या अध्यात्मिक वो संध्याकाळ की प्रार्थना में कहिये तो आप अपनी किस्मत बदल सकते है.

Wednesday, 4 April 2018

एक शक्तिशाली गुप्त साधना



एक शक्तिशाली गुप्त साधना

100% रिजल्ट देने वाली

मन्त्र कई प्रकार के होते है. सात्विक मन्त्र, राजस मन्त्र, तामसिक मन्त्र, शाबर मन्त्र, बीज मन्त्र और भी बहुत से. मंत्रो को जपने की भी बहुत सी विधियां भी दी हुई है हमारे शाश्त्रो में. पर मै आज आपको कुछ खास बात बताने जा रहा हूँ मन्त्र जपने के बारे में और मन्त्र शक्ति के बारे में.

यह जो विधि मैं आपको बता रहा हूँ यह अति गोपनीय विधि है. परन्तु इस विधि को अगर केवल गोपनीय ही बना कर रखा तो यह विधि शाश्त्रो में दब कर ही दम तोड़ देगी इसलिए बहुत सोच विचार कर मैं इस विधि को मैं आपको सिखाने जा रहा हूँ.

मैंने वास्तव में इस विधि को मॉडर्न साइकोलॉजी और पतंजलि योग सूत्र के सिद्धांत पर विकसित किया है. इस विधि पर पहले मैंने खुद एक्सपेरिमेंट किया है और फिर आपको बताने जा रहा हूँ.

सबसे पहले मैं आपको इस विधि को लेकर कुछ खास हिदायते देना चाहता हूँ ताकि अगर कोई समस्या आये तो उस स्थिति में क्या करना है.

सबसे पहली बात कि इस विधि से मन तो एकदम काबू में जायेगा. परन्तु उस वक़्त कुछ बाते हो सकती है.

एक दम शांति अनुभव हो सकती है.
दूसरा मन के रुकने से एकदम डर पैदा हो सकता है.
तीसरा एकदम उर्जा पैदा हो सकती है.
चोथा शरीर में वाइब्रेशन किसी भी जगह पर पैदा हो सकते है.
पांचवा शरीर में झटके भी लग सकते है.

बस अगर उर्जा ज्यादा पैदा हो या झटके ज्यादा लगे तो उसी वक़्त प्रैक्टिस को रोक देना है. डर लगेगा भी तो थोड़े समय बाद अपने आप ही ख़त्म हो जायेगा.

परन्तु मेरी बताई हुई विधि से आप यदि प्रैक्टिस करते है तो यह बात पक्की है कि रिजल्ट्स मिलेगे ही.
आप चाहे किसी भी धर्म से सबंधित हो और किसी भी मन्त्र पर जप आप करना चाहते हो यह विधि सभी मंत्रो पर काम करेगी.

अब असली बात पर आता हूँ कि करना क्यां है?

कोई भी मन्त्र जो आप जपना चाहते है. उदहारण के तौर पर मैं गायत्री मन्त्र लेता हूँ.

ॐ भूर्भुव स्वः।
तत् सवितुर्वरेण्यं।
भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

अब आप गायत्री मन्त्र जपना शुरू कीजिये. आपको एक साथ डबल मन्त्र जप करना है. जैसे आपने शुरू किया कि ॐ भूर्भुव स्वः अभी मन्त्र पूरा हुआ नहीं है उससे पहले साथ में ही एक और मन्त्र शुरू कर देना है यही फिर से ॐ भूर्भुव स्वः...

यानि मन में एक नहीं दो मन्त्र एक साथ चल रहे है पर टाइमिंग थोड़ी अलग है दोनों मंत्रो की. एक ख़त्म नहीं होता है की दूसरा शुरू हो जाता है या यूँ कह सकते है कि एक मन्त्र के शुरू होने के तुरंत बाद दूसरा शुरू हो जाता है.

अगर आप सही तरीके से ऐसा कर पाए तो एक दम रिजल्ट आएगा. एकदम तुरंत. बस विधि को सही तरीके से समझना है कि मन में एक साथ दो मन्त्र चलने चाहिए. शांति, आनंद, उर्जा, वाइब्रेशन, सब कुछ होगा. हो सकता है कि डर भी लगे. पर रुकना नहीं है. हाँ उर्जा ज्यादा महसूस होने लगे तो एकदम रोक देना है और बस एक ही मन्त्र पर आ जाना है.

आप किसी भी मन्त्र पर इस विधि का प्रयोग कर सकते है. कोई भी मन्त्र, किसी भी धर्म से ही. मैंने गायत्री मन्त्र का केवल उदहारण दिया है. आप एक ओंकार सतनाम. ॐ मणिपद्मे हुम्, आप अल्लाह या अन्य कोई इस्लामिक मन्त्र जप सकते है. आपके गुरु का दिया हुआ मन्त्र जप सकते है.

Tuesday, 27 March 2018

महात्मा बुद्ध के चार महान सत्य - Four Noble Truth of Gautam Buddha


अपने सामाजिक जीवन को छोड़ने के बाद, वो चार घटनाए देखने के बाद और बहुत कुछ समझने के बाद महात्मा बुद्ध ने चार महान सत्यों को उजागर किया.

दुःख – दुःख है - संसार में दुःख है.
समुदय - दुःख का कारण भी है 
निरोध – उस कारण का निवारण भी है
मार्ग – निवारण के लिय तरीका भी है

चार घटनाएँ – एक दिन जब सिद्धार्थ सैर पर निकले तो उन्होंने देखा – एक बुढा व्यक्ति जो लाठी के सहारे कापते हुए चल रहा था, फिर एक रोगी व्यक्ति को देखा, फिर उन्होंने एक अर्थी को देखा और अंत में उन्होंने एक सन्यासी को देखा जो अपनी ही मस्ती में मग्न था. बुद्ध अभी तक महलों में रहते आये थे उनके लिए यह तीनो घटनाए बिलकुल नयी थी, यह उनके लिए एक बिलकुल ही नया अनुभव था. वो हैरान रह गए यह देख कर कि इंसान को इतना दुःख भी मिल सकता है.

बड़े ही ध्यान से इन सभी बातों पर जो उन्होंने देखी थी उन पर विचार किया तो संसार को छोड़ दिया.

उन्होंने देखा कि संसार में दुःख है. उन्होंने इस बात पर काम किया कि दुःख है क्यूँ? यानि इस दुःख का कारण क्यां है? और अगर इसका कोई कारण है तो क्यां उसका निवारण भी है? उन्होंने पाया कि हा इस दुःख का निवारण भी है. निवारण का जो मार्ग उन्होंने दिया वो महात्मा बुद्ध की प्रमुख शिक्षाओ में से एक है. बौद्ध प्रतीकों में प्रायः अष्टांग मार्गों को धर्मचक्र के आठ ताड़ियों (spokes) द्वारा निरूपित किया जाता है.

बौद्ध धर्म के अनुसार, चौथे आर्य सत्य का अष्टांग मार्ग है - दुःख निरोध पाने का रास्ता। गौतम बुद्ध कहते थे कि चार आर्य सत्य की सत्यता का निश्चय करने के लिए इस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए :

सम्यक दृष्टि : चार Noble Truth में विश्वास करना
सम्यक संकल्प : मानसिक और नैतिक विकास की प्रतिज्ञा करना
सम्यक वाक : हानिकारक बातें और झूठ न बोलना
सम्यक कर्म : अपने कर्मो पर नज़र बनाये रखना ताकि वो आप सही कर्म ही करे
सम्यक जीविका : अपनी जीविका को शुद्ध रखना 
सम्यक प्रयास : प्रयास आपको खुद ही करना है कोई और नहीं आएगा
सम्यक स्मृति : सम्यक समृति आएगी अपने आप ही आएगी
सम्यक समाधि : निर्वाण पाना और स्वयं को मिटा देना.

क्यूंकि बहुत जरुरी था यह बताना कि करना क्यां है. तभी यह अष्टांग मार्ग सामने आया. वो तरीका बुद्ध ने दिया कि सबसे पहले दुःख को कैसे हटाया जाये. क्यूंकि समस्या यह थी कि हम जिसे सुख समझ रहे है वही वास्तव में दुःख है. मन को भगा भगा कर और मन के साथ भाग भाग कर सुख नहीं पैदा हो सकता. मन को रोक कर ही सुख पैदा हो सकता है और उसे सुख भी नहीं कहेंगे बल्कि आनंद कहेंगे.

वेदांत भी तो यही कहता है कि संसार की  कोई भी वस्तु, व्यक्ति या फिर रिश्ता आपको सुख दे ही नहीं सकता क्यूंकि किसी भी वस्तु विशेष का वास्तविक वजूद तो है ही नहीं. अगर कोई वस्तु विशेष वास्तविक है ही नहीं तो उससे उत्पन्न सुख वास्तविक कैसे हो सकता है. एक उदहारण वेदांत में बार बार दिया जाता है कि हम रस्सी को सांप समझ रहे है. और जब हम रस्सी को सांप समझ रहे होते है एक साथ दो गलतियाँ कर रहे होते है –
हम रस्सी को सांप समझ रहे है. – रस्सी को सांप समझ कर डर रहे होते है. 
हम रस्सी को रस्सी नहीं समझ रहे है – यानि हमने रस्सी पर तो काम अभी शुरू ही नहीं किया.
यही बात बुद्ध बताना चाहते थे.  

हमने मन के द्वारा खुद को बहुत सारे बन्धनों में बंधा हुआ है. यही बंधन ही हमारे दुःख का कारण है. तभी महात्मा बुद्ध ने कारण पर काम करने की बात की. बुद्ध ने समझ लिया था कि यदि मैं किसी को कारण तक ले जाता हूँ तो उसे निवारण तक आसानी से ले जाया जा सकेगा. 

Sunday, 25 March 2018

क्यां आपको डर लगता है?




जब मैं छोटा बच्चा था तो मुझे डर के बारे में कुछ ज्यादा नहीं मालूम था. मेरे पेरेंट्स को बताना पड़ता था कि यह डरने की बात है. पर आमतौर पर उन्हें एक बार ही बताना पड़ता था कि यह डर है या इस वस्तु से या फिर इस बात से डरना चाहिए. बस फिर वो डर हमेशा के लिए बना रहता था. हा कुछ डर तो उम्र बढ़ने के साथ साथ ख़त्म ही हो गए थे पर कुछ मेंटल पैटर्न बन कर हमेशा के लिए डर बन गए थे.

कुछ डर थे जैसे कि अँधेरे में नहीं जाना कोई भुत खा जायेगा. इस तरह के डर कई बार उम्र भर बना रहता है. मन में दर्ज हो गया था कि अँधेरा मतलब भूत तो होगा ही. ऐसे ही बहुत से डर हमारे जेहन के कई जन्मो से भी दर्ज होगे. हर व्यक्ति के अलग फोबिया है. किसी को उचाई से डर लगता है तो किसी को बंद कमरे में तो किसी को तंग जगह से और किसी को वीराने से तो किसी को अकेलेपन से.

मैं उन डरो की बात कर रहा हूँ जो बहुत सारे लोगो के जेहन में है. बाकि कुछ डर तो वास्तविक भी होते ई और उनसे डरना भी चाहिए. जैसे करंट से डरना चाहिए, आग से डरना चाहिए, ऐसी कोई भी वस्तु जो जीवन के लिए खतरा हो उससे जरुर डरना चाहिए और बचना चाहिए.

अब यह जो डर है यह है क्यां और यह दूर कैसे होंगे. देखिये डर वो मेंटल पैटर्न है हमें हमने ही अपने अन्दर सजा रखा है, जिसे हमने ही अपने मन को बताया है कि किस  स्थिति में ऐसा रिस्पांस करना है. डर भी मन है, डरना भी मन है और जो डरा रहा वो भी मन है.

अब यह मेंटल पैटर्न या संस्कार इतने सारे है कि उन्हें हटाने के लिए हमें मन का ही प्रयोग करना पड़ेगा. यह सभी के सभी मेंटल पैटर्न हमारे अवचेतन मन में चले गए है. अब अगर हमें इन मेंटल पैटर्न्स को हटाना है तो हमें अपने अवचेतन मन तक जाना होगा. देखिये बात बताने से कि - नहीं डरना नहीं चाहिए, डरो मत, साहसी बनो, डर कुछ भी नहीं होता मन का वहम होता है बला बला बला..इन सब बातो से न तो कभी डर गया है और न ही जायेगा.

अब अवचेतन मन तक कैसे जाये यह बात है. हमारे पास हमारे अवचेतन मन तक पहुचने का सबसे आसन तरीका है योग. और योग में अवचेतन मन तक पहुचने का सबसे आसन तरीका है योग निद्रा. और भी तरीके है, हम प्राणायाम से भी अवचेतन मन तक पहुच सकते है, मन्त्र जप से भी पहुच सकते है. पर योग निद्रा सबसे आसन है.

एक बड़ी खास बात है इसमें कि अगर हमने अवचेतन मन में किसी भी मेंटल पैटर्न को देख लिया तो वो समाप्त हो जाता है. इसके पीछे क्या साइंस है वो एक अलग matter है. लेकिन यह बात एकदम सच है.

योग निद्रा में हमें एक संकल्प करना होता है और वो संकल्प हमारे अवचेतन मन तक पहुचता है और जीवन में चितार्थ होता है. लेकिन अगर हम नियमित रूप से यदि ध्यान करे तब भी अपने डर से हमेशा के लिए निजात पा सकते है. ध्यान बहुत ज्यादा सहायक है डर को मूल रूप से समाप्त करने के लिए.
     





Saturday, 24 March 2018

एक अद्भुत ध्यान विधि



आज मैं आपको एक अद्भुत ध्यान विधि के बारे में बताने जा रहा हूँ. यह विधि पूरी तरह से व्यवाहरिक है और इस से बहुत ही अच्छे परिणाम आते है. इस ध्यान विधि को मैंने वेदांत और पतंजलि योग सूत्र के माध्यम से discover किया है फिर इस पर काम किया है और रिजल्ट्स मिलने के बाद मैं इस खास विधि को आप सबके साथ शेयर करना चाहता हूँ.

इस ध्यान विधि से मैं आपके मन को मंत्रो के माध्यम से टिकाने की कौशिश करूगां. जितना अधिक आप इस ध्यान का प्रयोग करेंगे उतनी ही आपकी एकाग्रता बढती जाएगी.

मैं आपको एक अक्षर मन्त्र से दुर्गा बतीस नामावली तक ले कर जाऊगा. पहले हम एक अक्षर मन्त्र पर अपना मन लगायेगे फिर 2 अक्षर फिर 3 और फिर और अधिक..इस तरह से हम मन्त्र उचारण के साथ साथ यह चेक करेगे कि कितनी बार हमारा मन भटका और किस मन्त्र पर हमारा मन सही तरह से टिक सकता है.
 
शुरुआत शंतिमंत्र से करेंगे

ॐ सहनाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः हि ॥
हरि ॐ .....

यह शान्ति मंत्र श्वेताश्वतरोपनिषद से है... जो कृष्ण यजुर्वेद शाखा का उपनिषद है...

भावार्थ: हे प्रभु ! आप हम दोनों ( गुरु-शिष्य) की रक्षा करें... हम दोनों का पोषण करें... हम दोनो को शक्ति प्रदान करें... हमारा ज्ञान तेजमयी हो... और हम किसी से द्वेष न करें...

फिर से एक प्रार्थना के रूप में एक मन्त्र बोलेगे

असतो मा सदगमय ॥ तमसो मा ज्योतिर्गमय ॥ मृत्योर्मामृतम् गमय ॥

(हमको) असत्य से सत्य की ओर ले चलो । अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो ।। मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो ॥।

अब हम सबसे पहले  ॐ मन्त्र पर ध्यान केन्द्रित करेगे. इस बीच मन कहा कहा भागता है. इसे चेक करते रहना है.

बार बार मन भागेगा और बार बार पकड़ कर लाना है. हमने दो काम एक साथ करने है एक तो ॐ को बोलना है और दूसरा अपने ही बोलो हुए ॐ को सुनना भी है. आप बोलते तो रहेगे पर सुनते वक़्त मन भटक  जायेगा बस उसे बार बार फिर पकड़ कर लाना है और फिर से ॐ, ॐ, ॐ, ॐ पर लगा देना है.

धीरे धीरे आपका मन भागना कम कर देगा. अब हम मन्त्र को और बड़ा करेगें

हरि ॐ – अब हरि ॐ ही चैंट करना है. और हरि ॐ पर ही मन को टिकाना है. हमने फिर से वही दो काम 
एक साथ करने है एक तो हरि ॐ को बोलना है और दूसरा अपने ही बोलो हुए हरि ॐ को सुनना भी है. अब भी वैसा ही होगा कि आप बोलते तो रहेगे पर सुनते वक़्त मन भटक  जायेगा बस उसे बार बार फिर पकड़ कर लाना है और फिर से हरि ॐ, हरि ॐ, हरि ॐ, हरि ॐ, हरि ॐ पर लगा देना है.

बात वही ख्याल रखनी है कि मन इस मन्त्र में कितना  टिक पा रहा है.

अब मन्त्र को और लम्बा करना है और मन को देखना है कि कितना टिक पाता है. अब मन्त्र होगा

हरि ॐ तत सत्

फिर वही तरीका मन ही मन बोलना और मन ही मन सुनना. मन अब भागना कम हो जायेगा. पर फिर भी बीच बीच में भागेगा फिर से पकड़ कर लाना है और हरि ॐ तत सत् लगा देना है.

अब द्वादश अक्षर मन्त्र का जप करना है. मन्त्र है -
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय..

तरीका वही है. देखते रहना है कि कब मन भटक कर भाग गया. कहा से निकल कर भाग गया. 
अब मन्त्र को लम्बा करना है. 24 अक्षर वाले गायत्री मन्त्र पर ध्यान करना है. 

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
भावार्थ:- उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

फिर वही तरीका मन ही मन बोलना और मन ही मन सुनना. मन अब भागना कम हो जायेगा. पर फिर भी बीच बीच में भागेगा फिर से पकड़ कर लाना है और गायत्री मन्त्र पर लगा देना है. मन किसी भी अक्षर से भाग सकता है इस बात का ध्यान रखना है.

अब मन्त्र को और भी लम्बा करना है और जितना ज्यादा मन इस मन्त्र पर टिक सके टिकाना है. अब दुर्गा बतीस नामावली

मां दुर्गा के 32 नाम
ॐ दुर्गा, दुर्गतिशमनी, दुर्गाद्विनिवारिणी, दुर्ग मच्छेदनी, दुर्गसाधिनी, दुर्गनाशिनी, दुर्गतोद्धारिणी, दुर्गनिहन्त्री, दुर्गमापहा, दुर्गमज्ञानदा, दुर्गदैत्यलोकदवानला, दुर्गमा, दुर्गमालोका, दुर्गमात्मस्वरुपिणी, दुर्गमार्गप्रदा, दुर्गम विद्या, दुर्गमाश्रिता, दुर्गमज्ञान संस्थाना, दुर्गमध्यान भासिनी, दुर्गमोहा, दुर्गमगा, दुर्गमार्थस्वरुपिणी, दुर्गमासुर संहंत्रि, दुर्गमायुध धारिणी, दुर्गमांगी, दुर्गमता, दुर्गम्या, दुर्गमेश्वरी, दुर्गभीमा, दुर्गभामा, दुर्लभा, दुर्गोद्धारिणी.

मन अगर एक बार भी बीच में नहीं भागे तो एक अच्छी achievement होगी.

फिर वही तरीका मन ही मन बोलना और मन ही मन सुनना. मन अब भागना कम हो जायेगा. पर फिर भी बीच बीच में भागेगा फिर से पकड़ कर लाना है और मन्त्र पर लगा देना है.